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निष्पक्ष एवं सत्य का प्रवर्तक

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Thursday, April 30, 2020

वक़्त एक सा नहीं रहता साहेब, कभी तो धुंध के बादल छटेंगे....मुकेश श्रीवास की कलम से


कोरोना के इस मुश्किल समय में हर इनसान पशोपेश में है..... की आखिर अब होगा क्या? क्या अब सामान्य जिन्दगी में वापिस जाना संभव होगा.. यकीनन वक़्त कठिन जरुर है पर ऐसा नहीं है की काटा ना जा सके....
आप घर में बैठ कर ही इस जंग को जीतने में मदद कर रहे है जी हाँ आप मे से हर एक कोरोना वारियर्स है...ये बात जरुर है की कुछ लोग इस कठिन समय में खुद को खुदा समझ बैठे है बकौल शायर अली सरमद बात कुछ इस तरह कही जा सकती है की *'यहाँ हर दूसरा इंसान खुदा खुद को समझता है। खुदा भी वो की जो अपनी ही झोली भर नही सकता'*.....  तो हम उनको याद दिला दें की जनाब धरातल पर उतर जाये मेहरबानी होगी| देश को बचाए, अपने प्रदेश को बचाए, अपने संभाग को बचाए, अपने 'जिले' को बचाए जो आपकी जिम्मेदारी है...अपना दामन न बचाए .... कहा जाता है इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता.. इसी तरह से कलमकारों से सच्चाई भी नहीं छिपती है पैरों की 'बिछिया' पैरों में ही अच्छी लगती है उसे नाक की नथ नहीं बनायीं जाती...नथ बनाकर 'बिछिया' की सच्चाई छिपा लो..छिपा लो...वक्त करवट बदलेगा  यह पूरा विश्व..मेरा देश..मेरा जिला..इस संकट से बाहर आयेंगे....मेरा विश्वास है हम इन्तेजार कर रहे है क्योकि यही हमारा काम है.... एक अंतहीन प्रतीक्षा या सही समय.... शायर के शेर की अगली लाइन कुछ इस तरह है भले झूठा मुनाफिक हूँ बहुत धोखे दिए लेकिन, मेरा कुछ वक्त बाकी है जमीन में गड नहीं सकता,,
संपादक 
रेवांचल टाइम्स अख़बार   राष्ट्रीय महासचिव 
भारतीय पत्रकार संघ(AIJ) 


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