रेवांचल टाइम्स : - साल 2016 के नवंबर की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर आकर ऐलान किया कि “आज मध्य रात्रि 12 बजे से 500 और 1000 के नोट चलन से बाहर हो जाएंगे। मतलब ये नोट केवल कागज के टुकड़े भर हो चुके थे।” यह खबर सुनते ही लोगों के बीच आपाधापी का माहौल पैदा हो गया था। जल्दी से लोग बाजारों की ओर निकल पड़े। सभी ने 500 और 1000 के नोटों से अधिक से अधिक खरीददारी कर डाली। इस वर्ष बीते 24 मार्च को इसी तरह एकबार फिर प्रधानमंत्री ने रात 8 बजे टीवी पर आकर कहा- “आज रात 12 बजे से संपूर्ण राष्ट्र में 21 दिनों की देशबंदी (लॉकडाउन) लागू होगी।” उन्होंने देश की जनता को संबोधित करते हुए कहा कि राशन और दवाइयां जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सामान्य दिनों की तरह जारी रहेंगी। साथ ही लोगों से अपील की कि इन 21 दिनों में घरों से बाहर न निकलें। आपके स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए और कोरोना को समाप्त करने के लिए यह फैसला लिया गया है।
यह सुनते ही एकबार फिर लोगों के मन में अनिश्चितता का भय पैदा हो गया। जनता ने दुकानों की ओर दौड़ भरनी शुरू कर दी। लोगों में खाने पीने, दवाओं और जरूरत की चीजों को खरीदने की होड़ लग गई। लोगों के मन में आशंका थी कि कहीं बाद में सामान मिलने में दिक्कतें या महँगा न मिले। इसलिए जिसे जैसे मौका मिला उसने दुकान से सामान खरीदना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में दुकानों से सामान खत्म होने लगा।
अब सवाल उठता है कि क्या सरकार ने इस लॉकडाउन की पहले से तैयारी की थी? तो इसका जवाब है नहीं। इसकी बानगी हमें बस अड्डे और रेलवे स्टेशन पर हजारों लोगों की जुटी भीड़ के रूप में देखने को मिली। जिस प्रकार नोटबंदी का एलान अचानक किया गया था, जिससे पूरे देश को दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। इसमें जो सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, वह गरीब मजदूर थे। जैसे नोटबंदी के समय अमीरों ने अपने प्रभाव और पहुंच से नोटबंदी जैसे समय में भी अपना रास्ता बना लिया था, ठीक उसी प्रकार कोरोना वायरस फैलने के बाद अमीर हवाई यात्रा करके अपने घरों तक पहुंच गए।
दोनों ही मामलों में गरीब मजदूरों और निम्न वर्ग को परेशानियों से गुजरना पड़ा। ये वो मजदूर थे, जो कहीं फैक्ट्री, बिल्डिंग निर्माण, मजदूरी, रिक्शा चालक, और अन्य दिहाड़ी मजदूरी करते थे। इसमें भी सबसे अधिक संख्या उन लोगों की है, जो प्रवासी मजदूर हैं, जो जो हमारे मंडला जिले से जाकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल जैसे महानगरों में कार्य करते हैं। भारत में 85 प्रतिशत लोग इसी असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत कार्य करते हैं। इन लोगों की आजीविका रोज कमा के खाने पर निर्भर होती है। नोटबंदी ने इन मजदूरों को लाइन में लगने को मजबूर किया, जिससे इनको काफी संकटों का सामना करना पड़ा था। एकबार फिर उसी प्रकार की अव्यवस्था हमे देशबंदी के एलान के बाद देखने को मिली।
उसके बाद जैसे तैसे देश में अनलॉक की प्रक्रिया प्रारंभ हुई लोगों ने पुनः अपने व्यापार जमाए मजदूर वापस अपने जिले से पलायन करके दूसरे राज्यों में जाकर कमाने खाने लगे, तो सरकार को उनका यह सुख देखा नहीं गया और पुनः सरकार नें लाक डाउन करने का फैसला लिया जिससे एक बार फिर गरीब मजदूर निम्न वर्गीय परिवार एवं छोटे व्यापारियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
एक बार फिर लोगों का व्यापार सरकार द्वारा लिए गए निर्णय से ठप्प होने लगा है जैसा कि हमें प्रतीत है,
मई माह से लेकर जून माह तक शादियों का सीजन होता है, और टेंट वाले, खाना बनाने वाले, कपड़े वाले,किराना वाले, सभी के लिए यह कमाई का दौर होता है। लेकिन इस तरह लाक डाउन करके सरकार ने एक बार फिर इन सभी के पेट पर लात मारी है ना जाने इस वर्ष भी इस सीजन में इन छोटे व्यापारियों ,टेंट व्यवसाई भाइयों का क्या होगा।
जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है की,
60 देशों को बैक्सीन बांट दी,डंका बजवा लिया,अब भारत मे बैक्सीन की कमी है, आखिर क्यों ?
ऑक्सीजन,रेमडीसीवर,कोविड आईसीयू पर साल भर में क्या किया? इनकी कमी से अफ़रा तफरी फैलना, किसकी जिम्मेदारी है ?
जब कुछ नही सूझता तो लॉक डाउन कर दिया,अब फिर वही भगदड़ शुरू करा दी।ट्रेन बसों में भागने लगे हैं लोग
रोजगार छीन लिए, आखिर ऐसा क्यों ?
आप संक्रमित हो जाओ तो देश और जनता की सेवा में हुए,कोई गरीब घर पालने के लिए संक्रमित हो गया तो जनता लापरवाह है। वाह क्या नीति है, ऐसा क्यों ?
हम सबका एक साल का अनुभव यही कहता है कि कोरोना एक समस्या है और लॉक डाउन एक हजार समस्याओं की जड़ है।
लॉक डाउन उपाय नही,विफलता छिपाने का औजार है।
नैनपुर रेवांचल टाइम से शालू अली की रिपोर्ट

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