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निष्पक्ष एवं सत्य का प्रवर्तक

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Tuesday, April 28, 2020

1000 KM पैदल चल पड़ा मजदूर, बनारस पंहुचा और मर गया,,अपना पिचका खाली पेट लिये

इस देश में गरीब होना मजदूर होना अभिशाप है क्युकी हमारे देश में गरीब मजदूर की हेसियत शरणार्थीयो से भी गई बीती है,क्युकी ना तो इनके पास कोई सरकारी पह्च्गन होती है और ना कोई रह्नुमा।ये व्यक्ति हैं रामजी ये बेगुसराय बिहार के थे,दिल्ली में पिछ्ले 10 वर्षों से मजदूरी करते थे,लोक डाउन के बड़ जाने से हताश हो कर ,क्युकी ना तो खाने के लिए पेसे बचे थे ना सर पर छत रही,सो पेदल चल दिये दिल्ली से अपने घर जो 1000 किलोमीटर से ज्यादा के फासले पर स्थित था,लेकिन बनारस पहुचते ही इनकी मृत्यू हो गई ,पता नही कितने दिन से भूखे पेट रात दिन चलते रहे होंगे इनका पिचका खाली पेट अपनी कहानी खुद बता रहा है ।यहा तक की जब इनके घर खबर की गई तो पिता ने कहा हमारे पास खाने के लिये तक अनाज नही है,हम इनका अंतिम संस्कार केसे करेंगे।इसके बाद पूलिस ने इनका अंतिम संस्कार किया ।।यही कहानी है एसे कई रामजी जेसे गरीब मजदूरों की जिनको इस लोक डाउन में  भूखों मरने को छोड़ दीया गया है,ना तो इनकी सुध केंद्र सरकार ले रही है,ना इनके राज्य,लेकिन विधायक और और पार्षद अपने बच्चों को कोटा से स्पेशल सेवा प्राप्त कर वापस ला रहें हैं इसमें कुछ गलत नही है,जब मौदी जी विदेश से स्वदेशी प्रवासी कोरोना पंछियों को देश वापस ला सकतें हैं तो हर ताकतवर इंसान को हक़ है वो जो चाहे वो करे ।मरने के लिए तो गरीब मजदूर जो मौजूद हैं ।। केंद्र सरकार से,प्रधानमंत्री जी से प्रार्थना है कि प्रवासी गरीब मजदूर जो अलग-अलग राज्यों में फसे हैं उनके लिये विशेष रेल गाड़ियों की व्यवस्था कर इन्हें इनके घर पहुचा दिजीये आज़ के हालत में इससे बड़ा कोई धर्म नही है,वरना ये मजदूर कोरोना से नही लेकिन भूख और थकान से जरुर मर जायेगें ।। इन हालातों पर दुष्यंत कुमार सिंह की पँक्तियाँ याद आ रही है जो आज के हालातों की सच्चाई बयाँ करती हैं " बदन भूख  से झुक कर दोहरा हुआ होगा,मैं सज़्दे में नही था तुझे धोखा हुआ होगा।"  दीपक सिंह की फेसबुक वाल से 

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