देखों कब तक जिन्दा रहेंगे...कोरोना तो नहीं... गरीबी मार डालेगी ....अब गरीब मत पैदा होना रे
मण्डला नैनपुर - दूसरे प्रदेशों में काम करने गए प्रवासी मजदूरों के सामने जब रोजी-रोटी का संकट आया तो उन्हें अन्य प्रदेशों में अपने आशियाने की ओर लौटने पर विवश होना पड़ा
मध्यप्रदेश के प्रवासी मजदूर भी दूसरे राज्यों से लौट रहे हैं.
: Lockdown: तपती सड़को पर पैदल चलते मजदूर... चौक पर बैठे मजदूर... मजदूरों को बिस्किट देते लोग... बस से राहत केंद्र जाते प्रवासी मजदूर... साइकिल से घर लौटते अन्य प्रदेशों के अलग-अलग जिलों के प्रवासी मजदूर...मण्डला जिले नैनपुर की चेकपोस्ट में इन दिनों यही दृश्य दिखाई दे रहे हैं. लॉकडाउन में गाड़ियों का परिचालन बंद होने से अन्य प्रदेश के प्रवासी मजदूरों का पैदल घर लौटने का सिलसिला जारी है. रोजी-रोटी की तलाश में घर छोड़कर दूसरे प्रदेशों में काम करने गए प्रवासी मजदूरों के सामने जब भूख-प्यास का संकट आया तो उन्हें अपने आशियाने की ओर लौटने पर विवश होना पड़ा.
कोई पैदल जा रहा है, तो कोई साइकिल से निकल पड़ा है. तो कोई 7 दिन में पैदल मण्डला-सिवनी की सीमा तक पहुंचा, तो किसी ने साइकिल से पांच दिनों में कई सौ किलोमीटर की दूरी तय की. पैदल चलकर पहुंचे कई ऐसे भी मजदूर थे, जिनके पांव जवाब दे रहे थे. पैरों में सूजन होने के बाद भी लड़खड़ाते कदम कही पर भी नहीं रुक रहे थे. लॉकडाउन की वजह से इन मजदूरों के अंदर कितने दर्द छिपे थे, चेहरे बयां कर रहे थे. अभी इनकी मंजिल बाकी थी
पैदल चलकर मध्यप्रदेश के नैनपुर में पहुंचे अन्य राज्यो के प्रवासी मजदूरों की विवशता ह्रदयविदारक कहानी कह रही. भूखे प्यासे अपनी मंजिल पर पहुंचने का जज्बा भी दिख रहा है. फिर भी दर्द के पीछे छिपी कहानी कुछ और कह रही है. सीमा पर पकड़े न जाएं इसके लिए ग्रामीण इलाके की सड़कों को अपना मार्ग चुना. फिर भी सैकड़ो प्रवासी मजदूर प्रशासनिक व्यवस्थाओं में नैनपुर आपदा राहत केंद्र पहुंच गए.
महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूर सुरेन्द्र राम ने कहा कि नागदा से पैदल तो कभी अन्य साधनों आ रहे हैं. वहां खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी. आलू स्टोर में काम करते थे. वहां काम खत्म हो गया. मालिक नहीं था. मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के जा रहे हैं. भूखे प्यासे चार रोज से पैदल चल रहे हैं. घर भी टूट गया है. बच्चे बाहर रहते हैं. बारिश का मौसम भी आ गया है. इसलिए हम सभी पैदल ही घर जाने को मजबूर हैं.
खगड़िया के प्रवासी मजदूर विनोद कुमार यादव कहते हैं कि नागदा से पैदल चल रहे हैं. पांच दिन हो गए. पैर फूल गए हैं, चला नहीं जा रहा है. भूखे मर रहे हैं. कोई गाड़ी मिल जाती तो अच्छा होता.
सहरसा के प्रवासी मजदूर रवींद्र यादव ने बताया कि साउथ से आए हैं. काम रोजगार सब ठप हो गया. लॉकडाउन पर लॉकडाउन हो रहा है. 22 मार्च से बिल्कुल बैठे हैं. लास्ट में इधर-उधर से कर्ज लेकर पैदल आ रहे थे. बाद में बस वाले ने चढ़ाकर यहां उतार दिया. आठ दिन लगा पैदल आने में. कुछ खाने को भी नहीं मिला. अभी उमरिया जिले तक जाना है.
बताया जा रहा है कि बॉर्डर पर जो चेकपोस्ट बनाया गया है, उस चेक पोस्ट पर प्रतिदिन पैदल या साइकिल से आने वाले लोगों को रोक लिया जाता है. वहां उनकी स्क्रीनिंग की जाती है. स्क्रीनिंग करने के पश्चात सीमा राहत केंद्र पर लाया जाता है. आज मण्डला सिवनी नैनपुर बॉर्डर चेकपोस्ट सेंटर पर कुल 18 लोगों को भेजा अपने ग्राम बस द्वारा भेजा गया इस कार्य मे सबसे ज्यादा पुलिसकर्मियों एवं अधिकारियों का सहयोग सराहनीय देखा गया है जिन्होंने मजदूरों को पहले छांव , फिर खाना और उसके बाद जाने का इंतजाम किया
मण्डला नैनपुर - दूसरे प्रदेशों में काम करने गए प्रवासी मजदूरों के सामने जब रोजी-रोटी का संकट आया तो उन्हें अन्य प्रदेशों में अपने आशियाने की ओर लौटने पर विवश होना पड़ा
मध्यप्रदेश के प्रवासी मजदूर भी दूसरे राज्यों से लौट रहे हैं.
: Lockdown: तपती सड़को पर पैदल चलते मजदूर... चौक पर बैठे मजदूर... मजदूरों को बिस्किट देते लोग... बस से राहत केंद्र जाते प्रवासी मजदूर... साइकिल से घर लौटते अन्य प्रदेशों के अलग-अलग जिलों के प्रवासी मजदूर...मण्डला जिले नैनपुर की चेकपोस्ट में इन दिनों यही दृश्य दिखाई दे रहे हैं. लॉकडाउन में गाड़ियों का परिचालन बंद होने से अन्य प्रदेश के प्रवासी मजदूरों का पैदल घर लौटने का सिलसिला जारी है. रोजी-रोटी की तलाश में घर छोड़कर दूसरे प्रदेशों में काम करने गए प्रवासी मजदूरों के सामने जब भूख-प्यास का संकट आया तो उन्हें अपने आशियाने की ओर लौटने पर विवश होना पड़ा.
कोई पैदल जा रहा है, तो कोई साइकिल से निकल पड़ा है. तो कोई 7 दिन में पैदल मण्डला-सिवनी की सीमा तक पहुंचा, तो किसी ने साइकिल से पांच दिनों में कई सौ किलोमीटर की दूरी तय की. पैदल चलकर पहुंचे कई ऐसे भी मजदूर थे, जिनके पांव जवाब दे रहे थे. पैरों में सूजन होने के बाद भी लड़खड़ाते कदम कही पर भी नहीं रुक रहे थे. लॉकडाउन की वजह से इन मजदूरों के अंदर कितने दर्द छिपे थे, चेहरे बयां कर रहे थे. अभी इनकी मंजिल बाकी थी
पैदल चलकर मध्यप्रदेश के नैनपुर में पहुंचे अन्य राज्यो के प्रवासी मजदूरों की विवशता ह्रदयविदारक कहानी कह रही. भूखे प्यासे अपनी मंजिल पर पहुंचने का जज्बा भी दिख रहा है. फिर भी दर्द के पीछे छिपी कहानी कुछ और कह रही है. सीमा पर पकड़े न जाएं इसके लिए ग्रामीण इलाके की सड़कों को अपना मार्ग चुना. फिर भी सैकड़ो प्रवासी मजदूर प्रशासनिक व्यवस्थाओं में नैनपुर आपदा राहत केंद्र पहुंच गए.
महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूर सुरेन्द्र राम ने कहा कि नागदा से पैदल तो कभी अन्य साधनों आ रहे हैं. वहां खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी. आलू स्टोर में काम करते थे. वहां काम खत्म हो गया. मालिक नहीं था. मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के जा रहे हैं. भूखे प्यासे चार रोज से पैदल चल रहे हैं. घर भी टूट गया है. बच्चे बाहर रहते हैं. बारिश का मौसम भी आ गया है. इसलिए हम सभी पैदल ही घर जाने को मजबूर हैं.
खगड़िया के प्रवासी मजदूर विनोद कुमार यादव कहते हैं कि नागदा से पैदल चल रहे हैं. पांच दिन हो गए. पैर फूल गए हैं, चला नहीं जा रहा है. भूखे मर रहे हैं. कोई गाड़ी मिल जाती तो अच्छा होता.
सहरसा के प्रवासी मजदूर रवींद्र यादव ने बताया कि साउथ से आए हैं. काम रोजगार सब ठप हो गया. लॉकडाउन पर लॉकडाउन हो रहा है. 22 मार्च से बिल्कुल बैठे हैं. लास्ट में इधर-उधर से कर्ज लेकर पैदल आ रहे थे. बाद में बस वाले ने चढ़ाकर यहां उतार दिया. आठ दिन लगा पैदल आने में. कुछ खाने को भी नहीं मिला. अभी उमरिया जिले तक जाना है.
बताया जा रहा है कि बॉर्डर पर जो चेकपोस्ट बनाया गया है, उस चेक पोस्ट पर प्रतिदिन पैदल या साइकिल से आने वाले लोगों को रोक लिया जाता है. वहां उनकी स्क्रीनिंग की जाती है. स्क्रीनिंग करने के पश्चात सीमा राहत केंद्र पर लाया जाता है. आज मण्डला सिवनी नैनपुर बॉर्डर चेकपोस्ट सेंटर पर कुल 18 लोगों को भेजा अपने ग्राम बस द्वारा भेजा गया इस कार्य मे सबसे ज्यादा पुलिसकर्मियों एवं अधिकारियों का सहयोग सराहनीय देखा गया है जिन्होंने मजदूरों को पहले छांव , फिर खाना और उसके बाद जाने का इंतजाम किया



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