रेवांचल टाईम्स डेस्क :- दुनिया की क्या बात करें ? अकेले भारत में कोविड दुष्काल की पहली लहर की चपेट में आने से ७४८ डॉक्टरों और मध्य मई तक दूसरी लहर में कोरोना संक्रमण से ४२० डॉक्टरों की दुखद मौत हुई है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार इनमें से अस्सी फीसदी डॉक्टरों की उम्र ५० साल से ऊपर थी। सबसे कम उम्र २६ साल के डॉ ने मरने से एक दिन पहले तक दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में कोरोना मरीजों की देखरेख की थी । क़रीब सवा साल में ११६९ से ज़्यादा डॉक्टरों की मौतें हुईं हैं।ये हालात तब इतने बदतर हैं, जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार देश में कुल आबादी के अभी तक महज १.८ प्रतिशत लोग ही कोरोना संक्रमित हुए हैं। अफ़सोस की बात है कि कोविड से इतने डॉक्टर दुनिया के किसी और देश में नहीं मरे हैं। जबकि बाकी स्वास्थ्य कर्मियों की मौतों की गिनती बताने वाला कोई स्रोत नहीं है। मई के किसी एक दिन कोरोना के ३७०० नए मरीज़ों में से २९० स्वास्थ्य कर्मी बताए गए थे। भारत मे मृत डॉक्टरों के आंकड़े तो जैसे तैसे उपलब्ध हैं, नर्स या अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के है ही नहीं।
‘द गार्डियन’ समाचार पत्र में छपी खबर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीते साल कोविड की पहली लहर में अमेरिका के ३६०७ स्वास्थ्य कर्मियों की मौत हुई थी, जिनमें से सर्वाधिक ३२ प्रतिश नर्सें थीं। मरने वाले फिजीशियन डॉक्टरों का प्रतिशत१७ था। यही अनुपात भारत में भी सटीक बैठता है। पिछले दिनों अकेले तमिलनाडु में कोविड से डॉक्टर तो १० मरे, वहीं नर्स, लैब सहायक, सीटी स्कैन ऑपरेटर वगैरह मिलाकर कुल ४३ मौतें हुई हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक मई के हर दिन देश में औसत क़रीब ३००० लोगों की कोरोना से मौत हुई है, जिनमें से हर रोज कम से कम २० डॉक्टरों की कोविड संक्रमण से मृत्यु हो रही है। ये डॉक्टर सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के अलावा मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत हैं। हालांकि डॉक्टरों की वास्तविक मौतें आंकडों से कहीं ज्यादा होने का अंदेशा है, क्योंकि करीब साढ़े३ लाख डॉक्टर ही इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य हैं।
‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की खबर विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से खुलासा करती है कि भारत में महामारी से जानी नुकसान सरकारी आंकडों से कहीं अधिक है। गौरतलब है कि हालात तब इतने बदतर हुए, जब देश के ६६ प्रतिशत डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ को वैक्सीन की दोनों डोज लग चुकी हैं। सरकारें डॉक्टरों, नर्सों और सभी स्वास्थ्य कर्मियों की सेवाओं को ताली-थाली और फूल बरसाने जैसे शगूफ़ों से कहने और दिखाने भर के सम्मान से कोरोना योद्धाओं को नवाज़ती तो हैं लेकिन कोविड की जंग में शहीद स्वास्थ्य कर्मियों के परिवारों को घोषित मुआवज़ा, सम्मान या सहायता राशि देने में ढीली चाल से काम करती हैं। न ही संक्रमित स्वास्थ्य कर्मियों के इलाज के लिए अलग से कोई व्यवस्था है। कुछ तो उन अस्पतालों में दाखिल हो जाते हैं, जहां वे काम करते हैं, लेकिन सब के पास ऐसी सुविधा नहीं होती।
राकेश दुबे

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