भगवान शिव ने ही सप्ताह के सातों दिनों की रचना की और हर दिन के हिसाब से उसके स्वामी यानी ग्रह निर्धारित कर दिए. आदि काल में भगवान भोलेशंकर द्वारा की गयी इस रचना को आज तक माना जा रहा है. जनमानस के लिए ही नहीं, बल्कि ज्योतिष एवं धर्म शास्त्र दोनों में ही वार और ग्रहों का बहुत महत्व है. इस बात का उल्लेख शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता में मिलता है.
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ एवं दयालु महादेव जी ने पृथ्वी लोक के उपकार के लिए वार अर्थात दिनों की रचना की. सबसे पहले उन्होंने अपने नाम से रविवार की कल्पना की, जो आरोग्य प्रदान करने वाला है. इसके बाद दूसरा वार अपनी मायाशक्ति का बनाया, जो संपत्ति प्रदान करने वाला है, जिसे हम लोग सोमवार कहते हैं.
जन्मकाल में दुर्गति ग्रस्त बालक की रक्षा के लिए भोलेशंकर ने तीसरे वार की रचना की, जो मंगल के नाम से जाना जाता है. इसके बाद आलस्य और पाप की निवृत्ति तथा समस्त लोकों के हित की इच्छा से लोकरक्षक भगवान विष्णु जी के नाम पर वार को बनाया. शिव जी ने पुष्टि और रक्षा के लिए ब्रह्मा जी का आयुष्कारक वार बनाया. इसके बाद तीनों लोकों की वृद्धि के लिए पहले पुण्य पाप का निर्माण किया गया और फिर उनको करने वाले लोगों को शुभ व अशुभ फल देने के लिए भगवान शिव ने इंद्र और यम के वारों का निर्माण किया. यह दोनों ही दिन क्रमशः भोग देने वाले और लोगों का मृत्यु भय दूर करने वाले शुक्रवार और शनिवार हैं.
हर दिन के स्वामी तय करते हुए शिव जी अपने अर्थात रविवार का स्वामी सूर्य को बनाया, जबकि शक्ति संबंधी वार के स्वामी सोम अर्थात चंद्र हैं. कुमार संबंधित दिन के लॉर्ड मंगल हैं, इसलिए इस दिन को मंगलवार भी कहते हैं. इंद्रवार के स्वामी बुध होने के कारण ही इस दिन को बुधवार भी कहा जाता है. ब्रह्मा जी के वार के अधिपति देवगुरु बृहस्पति और इंद्रवार के स्वामी शुक्र तथा यमवार के स्वामी शनि देव हैं.

No comments:
Post a Comment