जब-जब आदमी अज्ञान के अंधेरे में भटकता है. तब-तब भारत की पवित्र धरती पर महान आत्माओं ने जन्म लेकर ज्ञान की रोशनी बिखेरी है, जिससे मनुष्य जाति सही रास्ते पर चल सके और जीवन को सफल एवं सार्थक बना सकें । ये आत्मायें मनुष्य के रूप में धरती पर जन्मी, मगर इनके सतकर्मों के कारण इनको भगवान का दर्जा देकर पूजना शुरू कर दिया बिलासपुर कटनी रेलवे लाइन पर जिला उमरिया से 32 किलोमीटर की दूरी पर बांधवगढ़ स्थित है तत्कालीन रीवा नरेश श्री वीरभद्र सिंह जूदेव के राज्य काल में बांधवगढ़ का सुदूर प्रांतों में बड़ा नाम था बांधवगढ़ की धरती पर आज से लगभग 500 वर्ष पहले एक महान संत का "हुआ जिससे बांधवगढ़ की प्रसिद्धि में चार चांद लग गए।
भक्त माल के सुप्रसिद्ध टीकाकार श्री प्रिय दास जी के अनुसार बांधवगढ़ में श्री सेन भक्त का जन्म विक्रम संवत 15 में वैशाख कृष्ण 12 के दिन रविवार को व्रत योग तुला लग्न पूर्व भाद्र पक्ष के दिन एक बहुत ही तेजस्वी बालक के रूप में श्री चंद्र न्यायी के घर पर हुआ बचपन में इनका नाम नंदा रखा गया जिनको आज विश्व समुदाय राजगुरु भक्त शिरोमणि सेन महाराज के नाम से जाना जाता है इनकी माता का नाम नान भाई था नंदा जी के जन्म के समय सूर्य के समान तेजस्वी तथा और फोन चेहरे के कारण ही इनका नाम नंदा रखा गया नंदा जी बचपन से ही विनम्र दयालु और ईश्वर में वृद्ध विश्वास रखते थे।
श्री सेन महाराज ने गृहस्थ जीवन के साथ-साथ भक्ति के मार्ग पर चलकर हमें यह संदेश दिया कि मनुष्य दृढ़ संकल्प करके अपने चरम लक्ष्य को पाना चाहे तो भक्ति के कर्म पर अटूट विश्वास के साथ अपना जीवन उत्कृष्ट बना सकता है श्री नंदा जी सेन का जीवन सजातीय कर्म साधु सत्संग और ईश्वर आराधना में व्यतीत होता था यह साधु सत्संग प्रेमी थे इन की विशेषताएं मानव जीवन के लिए अनमोल रत्न है इसी संदर्भ में कहना होगा अवगत नाम निरंजन सेवा में क्या जानू तुम्हारी सेवा।
नंदा जी का अभी भाव ऐसे समय हुआ जब समाज में जाति पाती ऊंच-नीच और अन्य सामाजिक बुराइयां व्याप्त थी उन्होंने तत्कालीन निराश एवं हताश जनमानस में अपने कर्म भक्ति ज्ञान एवं पुरुषार्थ के द्वारा एक नई आशा एवं साहस का संचार किया मध्यकाल में संतों में श्री सेन जी महाराज का स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण और गौरव मंडित है क्योंकि इन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुसार जनमानस को शिक्षा और उपदेश के माध्यम से एक रूपता में पिरोया उन्होंने पवित्र एवं सात्विकता के साथ साथ अत्यंत प्रभावपूर्ण बा मार्मिक संदेशों से लाखों लोगों में एक नवीन आत्मविश्वास और चेतना रूपी ऊर्जा को प्रवाहित किया जिससे मानवीय स्वाभिमान की भावना जागृत हुई साधना की ज्योति से उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली और उज्जवल हो गया कि जन समुदाय आप ही आप उनकी और खींचा चला आता था उन्होंने समाज में मानवता का संदेश देकर जीवन का सच्चा मार्ग दिखाया धर्म और कर्म की सात्विक प्रेरणा दी एकता प्रेम और अहिंसा का दिव्य प्रकाश पाकर प्रेरित जीवन को कष्ट से मुक्ति मिली और भाईचारे की भावना बलवती हुयी ।
एक दिन की बात है कि सेंड भक्त जी प्रातः काल प्रभु की सेवा से निवृत्त होकर राजा की सेवा के लिए घर से निकले ही थे कि रास्ते में साधुओं की जमात मिल गई सैन जी ने प्रसन्नता पूर्वक सभी साथियों को प्रणाम करके भावविभोर होकर उन्हें अपने घर लेबल आए और उनके अतिथि सत्कार में लग गए उनका आदित्य साथ कार करके साधु संतों के साथ भगवान के कीर्तन करने में लीन हो गए कि उन्हें राज महल की शुद्ध ना रही अत्यंत दयालु कृपालु भगवान अपने भक्तों को राजदंड से बचाने हेतु स्वयं नंदा के रूप में राज महल में प्रविष्ट हुए तथा राजा वीर सिंह की सेवा में लग गए महाराजा को उस समय इतना अविस्मरणीय आनंद प्राप्त हुआ जितना जीवन में कभी नहीं हुआ अचानक जब भाई भी श्री नंदा जी को राजा की सेवा की याद आई तो वे अत्यंत शीघ्रता से ताजमहल की ओर चल पड़े तथा उन्होंने विलंब से आने के लिए क्षमा मांगी तब राजा ने कहा अभी तो तुम मेरी सेवा करके गए हो क्षमा किस बात की।
तक्षण महाराजा को भगवान विष्णु का साक्षात्कार हुआ और महाराजा बीर सिंह संत श्री नंदा के चरणों में गिर पड़े तथा उनका पूजन अर्चन कर के उन्होंने अपने राज्य के राजगुरु की उपाधि से सम्मानित किया तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा है कि पुण्य पुण्य बिनु मिलहि न संता।सत संगति संस्सुति कर अंता ।
भक्त जब निश्चल भाव से ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है तब भगवान स्वयं उनकी सेवा करने लगते हैं । संत शिरोमणि सेन जी महाराज जब भाव-विभोर होकर संकीर्तन में लीन हो गए तो भगवान को उनका रूप धारण कर राजा की सेवा करनी पड़ी। धन्य है भक्तों वात्सल्य प्रभु और धन्य है उनके ऐसे अनन्य भक्त। वृद्धावस्था मैं सेन जी महाराज काशी चले गए और वही कुटी बनाकर रहने लगे और लोगों को उपदेश देते रहे, वह क्षेत्र जहां सेन जी महाराज रहा करते थे आज चैनपुरा के नाम से जाना जाता है। श्री सेन महाराज, श्री रामानंद जी महाराज के शिष्य एवं संत कबीर और भक्त रैदास के सच्चे मित्र थे। बे वर्ग-भेद और जातीयता के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने छुआछूत और वर्ण संबंधी मानसिक संकीर्णता को मिटाने का सतत प्रयास किया । श्री सेन महाराज प्रत्येक जीव में ईश्वर के दर्शन करते थे, और अहिंसा तथा प्रेम का संदेश जीवन पर्यंत देते रहे।

No comments:
Post a Comment