रेवांचल टाईम्स डेस्क :- भारत की पहचान अभी भी वही है | “है अपना देश कहाँ वो बसा हमारे गांवों में”.अधिकांश लोग अब यह मानने लगे हैं कि दुष्काल की पहली लहर में भारत के गांव प्रभावित नहीं हुए , लेकिन दूसरी लहर ने गांवों को बुरी तरह प्रभावित किय । यद्यपि गांवों के स्पष्ट आंकड़े अभी आने बाकी हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में गांवों में इस दुष्काल का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। तीसरी लहर की मारक क्षमता के बारे में बताया जा रहा है कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा तबाही मचाएगी।
हमारे ग्रामीण इलाके मलेरिया, हैजा, टाइफाइड जैसे संक्रामक रोगों से लड़ने में अक्षम हैं, तब कोविड-१९ महामारी का सामना कैसे कर सकते हैं, एक सवाल है ? २०१८ में राज्यसभा में में आये उत्तर के अनुसार, देश में कुल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या २५६५० है। सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से १५७०० (६१.२ प्रतिशत) में केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है और १९७४ (७.६९ प्रतिशत) स्वास्थ्य केंद्रों पर तो डॉक्टर ही नहीं हैं। स्वास्थ्य, महिला एवं परिवार कल्याण, जनजातीय विकास, ग्रामीण विकास, जल संसाधन एवं पेयजल, आयुष, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालयों के साथ ही सर्वशिक्षा अभियान, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, एड्स कंट्रोल आदि स्भितो काम में जुटे हुए हैं, लेकिन स्वास्थ्य की दुर्दशा सबके सामने है। इस महामारी से निपटने की रणनीति तैयार की जानी चाहिए।
प्रत्येक ग्राम स्तर पर पूर्व से गठित ग्रामीण स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण समिति इस कठिन दौर में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। इस समिति को तत्काल सक्रिय एवं मजबूत बनाने की पहल की जानी चाहिए। इस समिति में ग्राम सभा, पंचायती राज संस्थान, अनुसूचित जनजाति तथा अनुसूचित जाति के साथ जनसंख्या बाहुल्य के अनुरूप पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यक समुदाय को प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है। महिलाओं की भागीदारी इसमें विशेष रूप से सुनिश्चित की गई है। सरकार के महत्वपूर्ण विभाग, जैसे, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तथा महिला एवं बाल विकास को इसमें मुख्य कार्यकारी भूमिका में रखा गया है। ग्रामीण मोर्चे पर यह समिति कारगर साबित हो सकती है। कोरोना वैक्सीन के प्रति उत्पन्न भ्रांतियों के निवारण में यह समिति विलक्षण भूमिका अदा करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। इस दुष्काल में जांच, निगरानी तथा घर में बंद कोरोना मरीजों तक जरूरी चिकित्सा सुविधा पहुंचाने में यह समिति मददगार साबित हो सकेगी। पंचायत स्तर पर गठित ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण समिति’ को स्वास्थ्य समन्वय के लिए सरकार प्रतिवर्ष अनुदान भी देती है। पूर्ववर्ती केंद्र सरकार ने पोषाहार की समस्या से निपटने के लिए एक ‘न्यूट्रिशन कॉलिशन’ बनाई थी। सभी मंत्रालयों को इसके साथ जोड़ा गया था। इसी दौरान एक शब्द सामने आया ‘कनवर्जन’। इसके तहत देश की कई सामाजिक और गैर-सरकारी संस्थाओं को जोड़ा गया। इस योजना के लिए दलाई लामा ने आर्थिक सहयोग दिया और कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन के नेतृत्व में इसे प्रारंभ किया गया।
‘ब्लॉक स्तरीय ऑपरेशनल प्लान’ ने आशा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। साथ ही, आंगनबाड़ी व्यवस्था खड़ी की। यही नहीं, सखी मंडलों का भी गठन किया गया। फिलहाल देश भर में आशा कार्यकर्ताओं की संख्या लगभग१० लाख है और आंगनबाड़ी श्रमिकों की संख्या छह लाजख के करीब। इसके बाद भी चमकी बुखार, चिकनगुनिया, डेंगू आदि से प्रत्येक वर्ष कई ‘ब्लॉक स्तरीय ऑपरेशनल प्लान’ ने आशा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। साथ ही, आंगनबाड़ी व्यवस्था खड़ी की। यही नहीं, सखी मंडलों का भी गठन किया गया। फिलहाल देश भर में आशा कार्यकर्ताओं की संख्या लगभग१० लाख है और आंगनबाड़ी श्रमिकों की संख्या छह लाख के करीब। इसके बाद भी चमकी बुखार, चिकनगुनिया, डेंगू आदि से प्रत्येक वर्ष कई हजार लोग मर जाते हैं। आखिर इन महामारियों से निजात कैसे मिलेगी? उत्तर है, देश में गैर-सरकारी संस्थाओं के माध्यम से स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना खड़ी की जाये | साथ ही, स्थानीय निकायों, खासकर ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय युवक-युवतियों को प्रशिक्षित करके स्थानीय समाज में स्वास्थ्य के प्रति पर्याप्त जागरूकता का संचार किया जाये । आज इसके अलावा न तो समाज के पास कोई दूसरा बेहतर विकल्प नहीं है |
राकेश दुबे

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